रविवार, 9 फ़रवरी 2014

निज का सबकुछ भूल बढ़ा जो,
राह प्रेम की टेडी मेडी|
पाए है उसने सच्चे मोती,
प्रीत के पावन और सुनहरी|
आत्मसात कर जो पर मन को
बूझ गया सब अनकही अबोली|
प्रीत के रंगों खेला करता नित
उसका अंतर पल पल होली|
तोड़ बहा जो तट बन्धन के,
प्रीत के निश्छल सागर में
तरा वही बीच भंवर में जिसने
अपनी नाव खुद जन डुबो दी|
कहते है उसको सब पगला
कुछ कहते रमता जोगी |
उसको क्या परवाह है जिसने

अपनी तो सुधबुध ही खो दी|