गुरुवार, 24 सितंबर 2015

सूख ना जाए भाव निर्झरी,
निर्बाध इसे बस बहने दो|
छंद बने या a बने ग़ज़ल वो,
चिंता छोडो रहने दो|
सजा उसे लो शब्दजाल में,
जो भाव दबे उर के भीतर|
शब्दों के निर्मल दरिया को,
सब बांध तोड़ उमड़ने दो|
समझेगा ना निष्ठुर मानव,
मन की पावन गाथा को|
बांधेगा वो बंध हजारो,
उसकी बाते रहने दो|


बारिशों के मौसम में दिल ये क्यूँ मचलते है,
गलबहियां पाने को प्यार की तड़पते है,
किसकी शरारत है ये जो तन मन सुलगते हैं
बारिशों के मौसम........
जब भी घिर आती हैं काली घटाएं
मन को जलाती हैं भीगी हवाएं
बर्फ सी लहराती है हम सिहरने लगते हैं
बारिशों के मौसम..........
जब बहने लगती है पुरबा पुरवाई
तमन्ना मचलती है ले ले अंगड़ाई
आग सी दहकती है हम पिघलने लगते हैं
बारिशों के मौसम..............
साथ बीते लम्हों की झीनी झीनी परछाई
आँखों में छलकती है चाहत की गहराई
सांसे थम सी जाती है हम बहकने लगते हैं
बारिशों के मौसम.........
भीगे भीगे आलम में यादों के दीप जलते हैं
मदहोश पलकों पर स्वप्न कई सजते हैं
यादें गहराती हैं आँखे छलकने लगती हैं
बारिशों के मौसम........
कभी कभी जब खुद से बातें होती हैं कुछ छिपे हुए गुबार बाहर आते हैं कुछ झूठ पकडे जाते है और कुछ सच ढ़क दिए जाते हैं| कभी कभी शब्द हलक में आकर अटक जाते हैं और कभी मन की गुत्थी सुलझाने से चूक जाते हैं| कभी लगता है खुद खुद के लिए अजनबी बन बेठे हैं | दूसरों को जानने का दावा करते थे मगर खुद से अनजान क्यूँ हैं हम| कौन है जो हमें समझा है या कौन है जिसे हमने जाना है |

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

निज का सबकुछ भूल बढ़ा जो,
राह प्रेम की टेडी मेडी|
पाए है उसने सच्चे मोती,
प्रीत के पावन और सुनहरी|
आत्मसात कर जो पर मन को
बूझ गया सब अनकही अबोली|
प्रीत के रंगों खेला करता नित
उसका अंतर पल पल होली|
तोड़ बहा जो तट बन्धन के,
प्रीत के निश्छल सागर में
तरा वही बीच भंवर में जिसने
अपनी नाव खुद जन डुबो दी|
कहते है उसको सब पगला
कुछ कहते रमता जोगी |
उसको क्या परवाह है जिसने

अपनी तो सुधबुध ही खो दी|  

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

वक्त बड़ा बेरहम हुआ है
गीता छोड़ महा संग्राम सजे है
कौन धर्म की राह सुझाये
योगीश्वर मुह मोड़ खडे  है|
राम कहाँ कित और भला वो
रावण तो हर और खड़े है
कौन निभाए प्रीत रीत से
विभीषण घर फूंक हँसे है|
दंश बना अपना ही साया
मौत दे रहा खुद अपना जाया
अब औरों की बात भला क्या
चीर हरे है खुद माँ जाया|
कहाँ जा रहे किस नई दिशा को
अब दूर उजाले पास अधेरे
युद्ध लड़े अर्जुन तब कैसे

जब लाखो संशय मन को घेरे|


profshalinisaxena













बात कहाँ थी कहाँ ये पहुँची
ये तो ना तुम हमने सोची
थे खामोश तो ही अच्छा था
दिल की ये हालत तो ना होती|
बहुत मनाया मगर ना माना
आखिर ये पगला जो ठहरा
लगा ही बैठा प्रीत गैर से
पाया क्या बस नींद भी खो दी|
दे आवाज़ किसे अब क्योकर
किसने कहा तुझे प्यार तू करना
अब क्या सोचे ओ दीवाने
तूने डगर एसी क्यों ले ली |
तुम समन्दर से भी गहरे
मैं नदिया की उथली लहरे, 
मेल कहाँ है तेरा मेरा
फिर क्यू मेरा दमन छेड़े | 
जुदा जुदा तासीर हमारी 
कंहाँ जुड़े तकदीर हमारी, 
हम दो अलग लोक के वासी
क्यूँ कर चल दूँ संग मैं तेरे| 
जीत सदा तेरी ही जिद है 
हार भला मुझको क्यूँ प्यारी 
फिर भी मिले दो दिल बेरागी 
जैसे मिले नित साँझ सवेरे|