मंगलवार, 14 जनवरी 2014

वक्त बड़ा बेरहम हुआ है
गीता छोड़ महा संग्राम सजे है
कौन धर्म की राह सुझाये
योगीश्वर मुह मोड़ खडे  है|
राम कहाँ कित और भला वो
रावण तो हर और खड़े है
कौन निभाए प्रीत रीत से
विभीषण घर फूंक हँसे है|
दंश बना अपना ही साया
मौत दे रहा खुद अपना जाया
अब औरों की बात भला क्या
चीर हरे है खुद माँ जाया|
कहाँ जा रहे किस नई दिशा को
अब दूर उजाले पास अधेरे
युद्ध लड़े अर्जुन तब कैसे

जब लाखो संशय मन को घेरे|


profshalinisaxena













बात कहाँ थी कहाँ ये पहुँची
ये तो ना तुम हमने सोची
थे खामोश तो ही अच्छा था
दिल की ये हालत तो ना होती|
बहुत मनाया मगर ना माना
आखिर ये पगला जो ठहरा
लगा ही बैठा प्रीत गैर से
पाया क्या बस नींद भी खो दी|
दे आवाज़ किसे अब क्योकर
किसने कहा तुझे प्यार तू करना
अब क्या सोचे ओ दीवाने
तूने डगर एसी क्यों ले ली |
तुम समन्दर से भी गहरे
मैं नदिया की उथली लहरे, 
मेल कहाँ है तेरा मेरा
फिर क्यू मेरा दमन छेड़े | 
जुदा जुदा तासीर हमारी 
कंहाँ जुड़े तकदीर हमारी, 
हम दो अलग लोक के वासी
क्यूँ कर चल दूँ संग मैं तेरे| 
जीत सदा तेरी ही जिद है 
हार भला मुझको क्यूँ प्यारी 
फिर भी मिले दो दिल बेरागी 
जैसे मिले नित साँझ सवेरे|