निज का सबकुछ भूल
बढ़ा जो,
राह प्रेम की टेडी
मेडी|
पाए है उसने सच्चे मोती,
प्रीत के पावन और
सुनहरी|
आत्मसात कर जो पर मन
को
बूझ गया सब अनकही
अबोली|
प्रीत के रंगों खेला
करता नित
उसका अंतर पल पल
होली|
तोड़ बहा जो तट बन्धन
के,
प्रीत के निश्छल
सागर में
तरा वही बीच भंवर
में जिसने
अपनी नाव खुद जन
डुबो दी|
कहते है उसको सब
पगला
कुछ कहते रमता जोगी
|
उसको क्या परवाह है
जिसने
अपनी तो सुधबुध ही
खो दी|