वक्त बड़ा बेरहम हुआ है
गीता छोड़ महा संग्राम सजे है
कौन धर्म की राह सुझाये
योगीश्वर मुह मोड़ खडे है|
राम कहाँ कित और भला वो
रावण तो हर और खड़े है
कौन निभाए प्रीत रीत से
विभीषण घर फूंक हँसे है|
दंश बना अपना ही साया
मौत दे रहा खुद अपना जाया
मौत दे रहा खुद अपना जाया
अब औरों की बात भला क्या
चीर हरे है खुद माँ जाया|
कहाँ जा रहे किस नई दिशा को
अब दूर उजाले पास अधेरे
युद्ध लड़े अर्जुन तब कैसे
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