कभी कभी जब खुद से बातें होती हैं कुछ छिपे हुए गुबार बाहर आते हैं कुछ झूठ पकडे जाते है और कुछ सच ढ़क दिए जाते हैं| कभी कभी शब्द हलक में आकर अटक जाते हैं और कभी मन की गुत्थी सुलझाने से चूक जाते हैं| कभी लगता है खुद खुद के लिए अजनबी बन बेठे हैं | दूसरों को जानने का दावा करते थे मगर खुद से अनजान क्यूँ हैं हम| कौन है जो हमें समझा है या कौन है जिसे हमने जाना है |
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