सूख ना जाए भाव
निर्झरी,
निर्बाध इसे बस बहने
दो|
छंद बने या a बने
ग़ज़ल वो,
चिंता छोडो रहने दो|
सजा उसे लो शब्दजाल
में,
जो भाव दबे उर के
भीतर|
शब्दों के निर्मल
दरिया को,
सब बांध तोड़ उमड़ने
दो|
समझेगा ना निष्ठुर
मानव,
मन की पावन गाथा को|
बांधेगा वो बंध
हजारो,
उसकी बाते रहने दो|
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